दु:शासनी दरबारों के पहरेदार क्या हम नहीं है: रीमा प्रसाद 

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मुझे आज़म ख़ान के बयान से ज़रा भी हैरानी नहीं हुई। आजम उसी पार्टी के कायदे आजम हैं, जिसके पितामह मुलायम कहते हैं  ‘लड़कों से ग़लती हो जाती है’। हमने चार दिन तक इस बयान पर कोहराम मचाया और आगे बढ़ गये। लेकिन अब राजनीति टोपी के रंग से अंडरवियर के रंग पर पहूंच गया है।
अब ज़रा इस लिहाज़ से सोचिये कि आज़म खान जैसा मानसिक लंगड़ा किसी हिडेन कैमरे के सामने नहीं बल्कि भरी चुनावी सभा में चटखारे लेते हुए अंडरवियर का रंग तय करता है . महफ़िल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठती है और यूपी के दुलारे बबुआ ये सोच कर ख़ामोश हो जाते हैं  कि इस चुनाव में लाज तो सिर्फ़ बुआ मायावती और पत्नी डिंपल की बचानी है। तभी एसपी -बीएसपी के गठबंधन के दिन अपने उन्मादी कार्यकर्त्ताओं को सन्देश दिया था ‘अब बुआ पर हमला बर्दाश्त नहीं’ । हालांकि यहां अखिलेश को अपने बहके नेताओं पर भी लगाम लगाने की बात करनी चाहिए थी लेकिन अखिलेश इतने कच्चे खिलाड़ी नहीं उन्हें मालूम है चुनावी महफिलें ऐसे नेताओं से ही लूटी जाती है।
तो हम दु:शासनी दरबारों के पहरेदार इस लिहाज़ से है कि महिलाओं के इज़्ज़त का पैमाना भी हमने पार्टी, रंग , नस्ल और क़द के हिसाब से तय कर लिया है .आप एक नाम महिला नेत्री का बताइए जिसकी इज़्ज़त पर आंच न आई हो दक्षिण में अम्मा (जयललिता) तो पूरब में बहनजी से लेकर प्रियंका गांधी को जब हालिया पूर्वी उत्तरप्रदेश की ज़िम्मेदारी सौंपी गई तो एक से बढ़कर टीका टिप्पणी की गई ।हम हद दर्ज़े  के मुरीद हो सकते हैं किसी पार्टी की लेकिन जब महिला अस्मिता की बात आये तो हमारी एकजुटता ही इन बहके नेताओं को राजनीति से बेदख़ल कर सकती है ।
हालांकि मुझे उम्मीद थी कि उस पार्टी की तरफ़ से कुछ बड़ा कदम उठाया जाएगा जिस पार्टी में रक्षा मंत्री से से लेकर विदेश मंत्री तक महिला ही है। लेकिन निराशा हाथ तब लगी जब निज़ाम टिवटर पर ख़ामोश है, शाह भाई भी कहीं रोड शो में मशगूल हैं, हां सुषमा स्वराज ने ट्विटर पर मुलायम सिंह को भाई भी लिखा है और पितामह भी और गुहार भी तो परिणाम के लिए इंतज़ार मत कीजिये, पितामहों का फैसला कब द्रोपदियों के पक्ष में रहा है ?
तो जयाप्रदा जी आख़िर में आपके पलटवार का इंतज़ार था लेकिन आपकी मासूमियत भरे जवाब पर वारी जाने का ये  मुफ़ीद वक़्त नहीं है .आपने जो कहा आज़म खान के लिए वो गांव -घर की कोई भी महिला सहज ही कह सकती है ‘कि तुम्हारे घर मां बहन बेटी नहीं है’ एक वाक़ये का ज़िक्र ज़रूरी है अभी कुछ ही रोज़ पहले आपकी पार्टी के धाकड़ नेता अश्विनी चौबे ने बिहार की पूर्व सीएम राबड़ी देवी को घूंघट में रहने की सलाह दी लेकिन पलटवार राबड़ी ने बड़े ही धारदार तरीके से की और सीधे बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ योजना पर सवाल दाग़ दिए। ये पूछा आप कहेंगे अपनी पार्टी के महिला नेताओं को घूंघट में रहने के लिए’
बेशक़ आप अपनी पार्टी पर सवाल न उठाइये , विशुद्ध राजनीति ही कीजिए ..जाइए रामपुर की गलियों में और पूछिए वहां की महिलायों से क्या वो ऐसे नेता को अपना रहनुमा बनाएंगी जो भरी महफ़िल में अंडरवियर का भेद खोलता है पूछिये उस बुर्का वाली महिला से क्या वो आज़म खानों के हाथ में अपनी सुरक्षा की ज़िम्मेदारी सौपेंगी जो मज़हबी तालीम को भी हंसी का पात्र बनाता है । मुझे उम्मीद नहीं पूरा यक़ीन है रामपुर की महिलाओं में इतनी ग़ैरत है कि वो इसका जवाब देंगी। इस लड़ाई में हम इसलिए आपके साथ नहीं कि आप नेत्री हैं इसलिए हैं कि आप जैसी ताक़तवर महिला को भी अगर कोई कुछ यूँ गाली दे कर चला जाये तो फिर आम महिलाओं को तो ये आजमों की फौज सरेराह रौंद देंगे।
रीमा प्रसाद मूल रूप से बिहार की बेटी है। अभी  FIRST इंडिया न्यूज़ , राजस्थान की एंकर हैं।

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