हाजीपुर सुरक्षित लोकसभा क्षेत्र,कांटे की टक्कर में सवर्ण वोटर अहम,राजद और भाजपा के नहीं बने अब तक सांसद

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हाजीपुर सुरक्षित लोकसभा क्षेत्र से लोजपा सुप्रीमो रामविलास पासवान इस बार चुनाव नहीं लड़ रहे।  एनडीए के घटक दलों ने यह सीट लोजपा को ही दी है। जहां से राम विलास पासवान के छोटे भाई पशुपति कुमार पारस इस बार लोजपा के उम्मीदवार हैं। उनके खिलाफ महागठबंधन ने राजद के शिव चंद्र राम को अपना उम्मीदवार बनाया है। यादव राजपूत और भूमिहार मतों के सहारे चुनावी वैतरणी पार करने की जुगाड़ में लगे राजद और लोजपा दोनों उम्मीदवार पहली बार लोकसभा का चुनाव लड़ रहे है।
गंगा और गंडक के तट पर बसे वैशाली जिले का मुख्यालय है हाजीपुर। इस इलाके का धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व भी है। हाजीपुर का इलाका दुनिया के पहले गणतंत्र वैशाली का हिस्सा था। भगवान बुद्ध और भगवान महावीर का इस इलाके से जुड़ाव था। आजादी की लड़ाई में इस इलाके के लोगों ने काफी बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया। आजादी के बाद हाजीपुर समाजवादी और लोकतांत्रिक वसूलों का गढ़ बना रहा। यहाँ कभी जातीयता राजनीति में अहम भूमिका नहीं रख पाई। हाजीपुर सुरक्षित लोकसभा सीट के अंतर्गत विधानसभा क्षेत्र के 6 सीटे आती है।  जिनमे हाजीपुर, लालगंज, राघोपुर, महुआ, राजापाकर और महनार सीट शामिल है।
2015 के विधानसभा चुनाव में 4 सीटो पर राजद को जीत मिली। जबकि 1-1 सीट ओर जदयू और बीजेपी के विधायकों को जीत मिली थी। समाजवादी सोंच के राम विलास पासवान को यहाँ की जनता ने 9 बार अपना प्रतिनिधि चुना। 1977 के बाद 2 चुनाव को छोड़कर सभी मे रामविलास पासवान को जीत मिली। केंद्र में सरकार चाहे किसी की हो हाजीपुर में समर्थन रामविलास पासवान को ही रहा है। हाजीपुर से लोकसभा चुनाव जीतने वाले रामविलास पासवान केंद्र में रेल, इस्पात और खाद्य आपूर्ति जैसे महत्वपूर्ण विभागों के मंत्री रहे हैं। 2014 के आमसभा चुनाव में रामविलास पासवान को 4,55,652 वोट मिले। जबकि कांग्रेस के संजीव प्रसाद टोनी को 2,30,152 वोट मिले थे।
हाजीपुर लोकसभा क्षेत्र के जातीय समीकरण की बात करे तो सबसे ज्यादा 2.75 लाख यादव मतदाताओं की संख्या है। उसके बाद करीब 2.5 लाख पासवान और 2.5 लाख राजपूत जाति के वोटर हैं। 1.5 लाख भूमिहार, लगभग 1.25 लाख कुशवाहा, कुर्मी और ब्राह्मण मतदाताओं को संख्या भी करीब सवा लाख है। रविदास जाती के 80 हजार, वैश्य और अन्य जातियों के वोटरों की संख्या करीब 2 लाख है। लोगो का कहना है कि रामविलास पासवान राजनीति हवा को जान लेते हैं, और उसके अनुसार रणनीति बनाते हैं। जिनका फायदा उनको मिलता रहा है। हालांकि विरोधी दलों के कमजोर उमीदवार भी उनकी जीत का कारण साबित होते हैं।
1957 से लेकर अभी तक राजद और बीजेपी यहाँ जीत नहीं पाई हैं। 1957 से 1971 तक कांग्रेस, 1977 में भारतीय लोकदल से रामबिलास पासवान रिकॉर्ड मतो से जीते। उसके बाद 1980, 84, 89, 96, 99 2004 और 2014 में भी उन्हें जीत मिली। करीब 5 दशक तक सियासत में रहने के बाद रामाविलास पासवान इस बार लोकसभा क्षेत्र का चुनाव नहीं लड़ने का फैसला लिया है।

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