बिहार का कथित चमकी बुखार, मौत या हत्या: स्वाति आनंद 

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चमकी बुखार ने अपना कहर यूँ बरपाया की अब तक 132 बच्चे  अपनी जिंदगी से जंग हार गए।  कई माँओं की गोद सुनी हुई तो कई पिता का घर टूट सा गया । बच्चे जिन्हें बेहतर कल का भविष्य मन जाता है, उनका इस तरह बीमारी से बड़ी संख्या में मारा जाना दिल को झकझोर दे रहा है। मुजफ्फरपुर में चमकी बुखार से भारी संख्या में बच्चों की हुई मौत ,मौत्त नहीं बल्कि हत्या है । एक निर्मम ढंग से की गयी हत्या।
हत्या जो की हमारे देश के उन जन प्रतिनिधियों द्वारा की गयी है जो कुछ दिनों पहले उसी मुजफ्फरपुर का चक्कर अपनी वोट की झोली भरने के लिए काट रहे थे, उन्ही जनप्रतिनिधियों द्वारा जो बड़ी- बड़ी रैलियां कर रहे थे । इतने बच्चों के मौत का जिम्मेदार कौन है?  क्या है कोई, जो उन माँओं के बुढ़ापे का सहारा बन खड़ा रहेगा। क्या है कोई, जो उन बापों के बुढ़ापे का लाठी बनेगा ।नहीं ! कोई नही हो सकता । आज जिन घरों का चिराग गुल हो चूका है ये वही लोग है साहब। जिन्होंने उन जनप्रतिनिधियों  के लिए कड़ी धूप में कतार में लगकर उनकी झोली भरी थी। कैसे भूल सकते हैं इन लोगों को?  शर्म आती है, इस राज्य की व्यवस्था को देखकर ,इस राज्य की शासन की प्रणाली को देखकर की यहाँ न तो बेहतर शिक्षा है और न ही बेहतर स्वास्थ्य देखभाल की सुविधा ।
आज यदि उन बच्चों का सही ढंग से इलाज किया जाता ,साफ़ सुथरे जगह में उनकी इलाज होती तो शायद बच्चों के चमकी बुखार से मरने का आंकड़ा इतना बड़ा नही होता । चमकी बुखार सरकार के लिए एक चुनौती है या कह ले की यह उन जनप्रतिनिधियों के मुह पर तमाचा है, जो कुछ ही दिनों पहले सत्ता की होड़ के लिए उसी मुजफ्फरपुर  में चक्कर काट रहे थे। चलो ! 17 दिनों बाद ही सही एक जन की नींद खुली तो ले आये जायजा । शायद जायजा इस बात का भी हो सकता है कि कितने परिवार वालों की मुआवजा देना होगा। हाँ, यही तो होता आया है। मौत को मुआवजे की तराजू पर रख कर बराबर कर दिया जाता है।
बस यह अनुरोध है सरकर से की जो बच्चे अभी अपनी जिंदगी और मौत से जंग लड़ रहे उनको अपना बच्चा समझकर उनकी बेहतर इलाज की प्रक्रिया शुरू करें । शायद मुजफ्फरपुर के बीमार अस्पताल में बेड पर पड़ा कोई बच्चा कल का एपी जे अब्दुल कलाम ,अटल बिहारी बाजपेयी ,नरेंद्र मोदी या स्वयं नितीश कुमार हो।

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