वैशाली के लूटते वैभव-पीटते गौरव को अब कौन बचाएगा? नालंदा के लाल तुले हैं गौरवशाली वैशाली को करने पर कंगाल!

0
214
सुबोध कुमार सिंह ( वैशाली ) वह अकेला ही चला था, न लोग जुड़े और न कारवां बना..। कारवां बनता भी तो कैसे? उन्होंने मुर्दा कौम को जिंदा, जड़ को चेतन समझ लिया था। चेतना गंवा बैठे वैशाली के लोगों को जगाते-जगाते खुद चिरनिद्रा में सो गया वह मलंग। उन्हें ब्रह्मबाबा भी कहा गया। वे संत ही तो थे, भूल से या यूं कहें समय ने कालिख से सनी राजनीति की काली कोठरी में धकेल दिया, बावजूद बेदाग निकले। अपने माटी का कर्ज उतारने के लिए उन्होंने अपना सर्वस्व जीवन ही समर्पित कर दिया। जीवन के आखिरी क्षण में उपेक्षा, अपमान का दंश भी उनके हृदय को जितना छलनी नहीं किया होगा उससे ज्यादा मलाल इस बात का रहा होगा कि अपनी जन्मभूमि का मुकुटमणि वैशाली के लूटते-पीटते वैभव, सांस्कृतिक-ऐतिहासिक विरासत को बचा नहीं सके।
लड़ाई जो रह गई अधूरी…
वैशाली अस्थिकलश प्रकरण वैशाली के लोगों को साधारण लग सकता है पर यह सांस्कृतिक विरासत अपहरण की गहरी साजिश थी और है। दिवंगत रघुवंश बाबू ने इसे भांप लिया था। सबको मालूम है कि रेलिक स्तूप के नीचे हुई खुदाई से प्राप्त भगवान बुद्ध के अस्थिकलश को सुरक्षा का हवाला देकर पटना ले जा गया। लंबे समय तक लौटाने की दिशा में कुछ खास न होता पाकर रघुवंश बाबू समझ लिया कि मंशा लौटाने की नहीं है। बुद्ध के अस्थिकलश के बिना वैशाली अब भी निष्प्राण है। मालूम है कि सड़क से संसद फिर कोर्ट तक उन्होंने लम्बी लड़ाइयां लड़ी। कोर्ट के आदेश से राज्य सरकार के मुखिया ने अस्थिकलश न केवल लौटाने बल्कि बुद्ध सम्यक संग्राहालय बनवा कर स्थापित-प्रतिष्ठित करने का आश्वासन दे रखा है। यह काम अब भी काफी दूर है। कोरोना काल से पहले रघुवंश बाबू ने अपनी आशंका जाहिर करते हुए कहा कि अजातशत्रु की मंशा वैशाली के प्रति जरा भी नहीं बदला है। डर तो इस बात की है कि अस्थिकलश की प्रतिकृति वैशाली को दे दी जाए। दशकों बाद कहा जाए कि अस्थिकलश यहां नालंदा में भी है, क्योंकि बुद्ध के अस्थि का एक हिस्सा मगध समेत सभी 16 महाजनपदों को भी मिला था। हालांकि उन सभी का अता-पता नहीं है। उन्होंने खुद स्वीकार किया था कि वे आधी लड़ाई भी नहीं जीत पाए हैं।
वैशाली से छीन गई महावीर जन्मभूमि की मान्यता…
अब तक ज्ञान बखारने वाले बुद्धिजीवी, अलंकारिक भाषण वाले जिले के नेतागण, 24 वें जैन तीर्थंकर भगवान वर्धमान महावीर की जन्मभूमि, भगवान बुद्ध की कर्मभूमि…से अपने भाषण की शुरुआत किया करते थे। अब यह भूल जाइए। आपको मालूम है कि भगवान महावीर की वैशाली के बासोकुण्ड कुंडग्राम में हुए जन्म की प्रतिपादित मान्यता छीन चुकी है। यह वैशाली और मुजफ्फरपुर की साझी सांस्कृतिक विरासत है। भौगोलिक रूप से यह क्षेत्र सरैया अन्तर्गत आता है। बताते चलें कि रघुवंश बाबू को चल रही इसकी साजिश की भनक पहले से थी पर इतना जल्दी यह सब हो जाएगा, इसकी उन्हें उम्मीद नहीं थी। कोरोना के कहर से पहले हाजीपुर सर्किट हाउस में मैंने सबूत के साथ यह जानकारी दी तो वे हतप्रभ रह गए। काफी देर तक सन्नाटे में रहे। बिना कुछ बोले मेरे पास से उठ गए। बाद में देर रात उन्होंने मुझसे फोन पर बातें कर अपडेट लिया।
जरा जानें क्या है पूरा मामला…
ऐतिहासिक वैशाली के बासोकुण्ड के कुंडग्राम को भगवान महावीर की जन्मभूमि के रूप में करीब 100 वर्ष पूर्व मान्यता दी गई थी। 1902 में यहां महल का अवशेष खंडहर रूप में मिला था। अंग्रेजों ने यहां खुदाई कराई तो राजा सिद्धार्थ राज के अवशेष मिले। उसके बाद भगवान महावीर की जन्मभूमि मान लिया गया। इतिहास बताता है कि उस परिक्षेत्र का एक हिस्सा ऐसा भी था जहां जंगल-झाड़ भी नहीं उगते थे। उस हिस्से को अहल्या यानी जहां हल भी न चले..कहा जाता था। किवदंति है कि चरने के लिए आने वाली दुधारू गाएं उस खास स्थान पर दूध देने लग जाती थीं। स्वतः ही उनके थन से दूध का स्राव होने लगता था। अंग्रेज इतिहासकार कनिंघम आदि की रिपोर्ट के आधार पर पुरातत्व विभाग ने फिर से उस भूभाग की खुदाई कराई। खुदाई में भगवान महावीर के बाल्यकाल की मूर्ति के साथ और भी साक्ष्य मिले। इसके बाद जन्मभूमि को प्रामाणिक मान लिया गया। इतना ही नहीं वैशाली के अन्वेषक महान इतिहासकार डॉ योगेंद्र मिश्र के नेतृत्व में इतिहासकार, पुरात्ववेत्ताओं की टीम ने गहन शोध किया। डॉ मिश्र 1973 से 1980 तक पटना विश्विद्यालय में इतिहास विभाग के अध्यक्ष भी रह चुके हैं। उन्होंने शोध, गहन अन्वेषण के बाद An early history of vaishali नामक प्रामाणिक इतिहास की पुस्तक लिखकर जन्मस्थान की प्रामाणिकता पर मुहर लगा दी। 1956 में ही देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेन्द्र प्रसाद ने आधारशिला रखी थी। तब देश-दुनिया भर में फैले जैन साधु-साध्वी, जैन धर्म के शोधकर्ता सभी ने जन्मभूमि को मान्यता दी।
नालंदा को दी जा चुकी मान्यता…
नालन्दा से तीन किलोमीटर की दूरी पर मिलता-जुलता नाम वाला स्थान कुंडलपुर है। इसी जगह को अधिकांस जैनियों ने भगवान महावीर की  जन्मभूमि मान लिया है। यहां 101 फुट ऊँचा नंद्यावर्त मंदिर तीर्थ बन चुका है। 2003,-04 में बनकर मंदिर तैयार हुआ था।
जैन साध्वी व विदुषी ने पलट दी मान्यता…
जैनियों की सर्वाधिक आदरणीया साध्वी हैं गणिनी आर्यिका ज्ञानमती। सौ से ज्यादा जैनधर्म से सम्बंधित पुस्तकें लिख चुकी हैं। सन 2000 तक वैशाली जन्मस्थान के प्रति आस्थावान रहीं। साल भर बाद ही उनकी आस्था पलट गई। केंद्र में नालंदा के लाल कैबिनेट मंत्री थे। बताया जाता है कि 2001 में पहली बार साध्वी ने दिल्ली में ही घोषणा की कि नालन्दा का कुंडलपुर ही भगवान महावीर की जन्मभूमि वास्तविक है। इतिहासकारों-पूरारातात्विकों के प्रमाण व लिखे इतिहास झूठा है। साध्वी ज्ञानमति के अनुयायियों की संख्या लाखों में है। पता है कि जैनी देश में काफी सम्पन्न हैं। उनके आह्वान पर नालन्दा आकर जैनियों ने 22 माह के भीतर विशाल-भव्य मंदिर का निर्माण करा दिया। बताते चलें कि जमुई भी वर्षों से लक्षुआर के कुंडुपुर पर जन्मस्थान होने की दावेदारी कर रहा है। कहते हैं न दो के झगड़े में तीसरे को लाभ। साम-दाम की नीति अपनाकर नालन्दा वैशाली का एक और गौरवपूर्ण विरासत अपहरण कर ले गया।
अब क्या होगा इसके बाद?
रघुवंश बाबू के निधन के साथ वैशाली के गौरव पुनर्वापसी के आंदोलन की आग बुझ चुकी है।
वर्तमान वैशाली-मुजाफ़रपुर के सांसद-विधायक से कोई उम्मीद नहीं है। जिले के बुद्धिजीवी, साहित्यकार, मुझ जैसे पत्रकार, संस्कृतिककर्मी आत्ममुग्धता, आत्म प्रवंचना के शिकार हैं। मुख्यमंत्री, राज्यपाल वैशाली गढ़ पर 26 जनवरी, 15 अगस्त को तिरंगा फहराएं, यह रघुवंश बाबू की और जिलावासियों की मुख्य मांग नहीं हो सकती है। आवश्यकता अपनी विरासत बचाने की है।
हम क्या कुछ कर सकते है? 
मुझे रत्ती भर उम्मीद नहीं पर आपसे कहना चाहूंगा कि अभी नहीं तो फिर कभी नहीं। माध्यम जो हो फेसबुक, ट्विटर, पोर्टल, व्हाट्सअप सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से लोगों को जगाएं। पहले जो मैंने कहा उसकी सत्यता की पुष्टि कर लें। गूगल पर वर्द्धमान महावीर जन्मभूमि सर्च करें। आधिकारिक बेवसाईट नालंदा ही बताएगा। हम अपनी भावी पीढ़ियों को जबाव दे सकें इसलिए जोत जगाने का प्रयास करने में क्या हर्ज है। सकुचाते-लजाते यह तो कह ही सकेंगे कि हम अपनी विरासत को बचाने का प्रयास किया था।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here