Citius Altius Fortius ओलंपिक गाथा, मीराबाई चानू : संघर्ष परत-दर-परत, ओलंपिक में रजत

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दिलीप कुमार…
परिवार के सदस्यों ने बचपन में ही जान लिया था उसके बाजूओं में बहुत दम है। लकड़ी के गट्ठर ढोते-ढोते बड़े भाई थक जाते। सुस्ताने के लिए पेड़ के नीचे बैठते। मगर वह लगी रहती। बिना रुके। बिना थके। परिवार के सदस्यों को यदि लकड़ी का कोई बड़ा टुकड़ा जंगल में मिल जाता तो उसे घर तक लाने की जिम्मेदारी भी उसके कंधों पर ही होती जिनमें गजब की ताकत थीं। उसने कभी इन्कार भी नहीं किया। पूरे घर की उम्मीदों का बोझा बचपन से ढोने वाली उस लड़की ने देश की उम्मीदों का वजन भी उठाया। टोक्यो ओलंपिक में 202 किलोग्राम वजन उठाकर मीराबाई चानू नाम की उस लड़की ने नया इतिहास रचते हुए भारत के खाते में चमकता हुआ रजत पदक डाल दिया। उसकी सफलता से पूरे देश का सीना चौड़ा हुआ। उसने अपना पदक देश को समर्पित कर दिया तो सवा सौ करोड़ लोगों के मन में रजत की ज्योति फैल गई। मीराबाई चानू ने सफलता की अद्भुत कहानी लिखी।
मणिपुर की राजधानी इम्फाल से करीब 50 किलोमीटर दूरी पर स्थित गांव नोंगपाक काकचिंग में 8 अगस्त 1994 को जन्म लेने वाली मीराबाई चानू की दमकती हुई सफलता एक दिन में नहीं लिखी गई। कठिन परिश्रम, उचित मार्गदर्शन तथा नियमित सघन प्रशिक्षण के बल पर मीराबाई चानू ने सफलता की सीढ़ियां चढ़ने में कामयाबी पाई। गांव में लकड़ी का बोझा उठाने वाली लड़की कुछ नया करने के जुनून के साथ इम्फाल आई थी। गांव के लड़के फुटबॉल खेलते थे। लेकिन, फुटबॉल खेलने के दौरान उनके कपड़े गंदे हो जाया करते  थे। नन्हीं मीरा को कपड़ों का गंदा हो जाना पसंद नहीं था। परंतु खेलों में रूचि थी। तो उसने तीरंदाजी में अपनी किस्मत चमकाने का ख़्वाब सजाया। लेकिन, दुर्भाग्य से इम्फाल में उसे कोई ऐसा स्थान या मार्गदर्शक नहीं मिला जो उसे तीरंदाजी का गुर सिखाते। इम्फाल के खुमान लंपक प्रशिक्षण केंद्र में उसने प्रसिद्ध भारोत्तोलन कुंजारानी देवी को पदक जीतकर देश का नाम रोशन करते हुए देखा। यहीं से उसे नई दिशा मिल गई। उसने भारोत्तोलन में ही मुकाम हासिल करने का फैसला किया, जिसके बाद प्रारंभ हो गया कठिन परिश्रम का दौर। अकादमी में रोज सुबह 6:00 बजे रिपोर्ट करना होता था।
इसके लिए मीराबाई चानू को सुबह 4:00 बजे ही घर से निकलना पड़ता और दो बस बदलते हुए 6:00 बजे तक अकादमी पहुंच जाना पड़ता। अनुशासन प्रिय मीराबाई चानू ने कभी भी कोताही नहीं बरती। चाहे झमाझम बारिश हो रही हो या फिर कड़ाके की ठंड पर रही हो, 21वीं सदी की मीराबाई प्रशिक्षण के लिए हाजिर हो जाती। बिना अनुपस्थित हुए। न कभी कोई बहाना किया और न ही कभी अपने लिए अतिरिक्त सुविधाओं की मांग की। प्रशिक्षकों ने उसे विश्वास दिला दिया था कि मेहनत का फल मीठा होता है। लेकिन, वह मीठा फल तभी मिलता है जब हम अपनी ओर से कोई कसर बाकी न रहने दें। मीराबाई चानू ने ऐसा ही किया। किसी दिन बस के किराया देने के पैसे नहीं होते, तो उधार लेकर काम चलाती। वापसी में रेत के ट्रक पर बैठकर घर लौट आती ताकि कुछ पैसे बच सकें। किसी दिन साइकिल चलाते हुए ही एकेडमी पहुंच जाती। सुबह से शाम तक बाहर रहती और घर में बना चावल खा कर काम चलाती। लेकिन, हौसले को कभी कम नहीं पड़ने दिया। खेल पर फोकस रखते हुए धीरे-धीरे वजन उठाने की अपनी क्षमता को बढ़ाया। मीराबाई चानू की मेहनत ने रंग लाया। उसकी पहचान राष्ट्रीय स्तर पर बनने लगी। राष्ट्रीय स्तर की सफलताओं ने उसे मजबूती प्रदान की। बचपन में ओलंपिक खेलों के बारे में कुछ भी न जानने वाली मीराबाई चानू की आंखों में ओलंपिक पदक जीतने का सपना सजने लगा। 2014 के राष्ट्रमंडल खेलों में रजत पदक पाकर उस सपने ने उड़ान भरी। ब्राजील की वाणिज्यिक राजधानी रियो डी जेनेरियो में 2016 का ओलंपिक आयोजित हुआ जिसमें मीराबाई चानू को भाग लेने का अहर्ता प्राप्त हुआ।
कम उम्र, कम अंतरराष्ट्रीय अनुभव और उम्मीदों का भारी बोझ। रियो ओलंपिक में मीराबाई चानू ने अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया, इस चाहत के साथ कि सवा सौ करोड़ की आबादी वाले देश को खुशी के कुछ पल वह दे सके। लेकिन, ऐसा हो न सका। अंतरराष्ट्रीय स्पर्धाओं में कम अनुभव के कारण मीराबाई चानू उम्मीदों के बोझ तले लड़खड़ा गईं। भारत सोलंकी क्लीन एंड जर्क स्पर्धा में नियमानुसार मान्य तीनों प्रयासों में तकनीकी आधार पर उन्हें विफलता प्राप्त हुई और इसी आधार पर उन्हें रैंकिंग सूची से भी बाहर कर दिया गया। यह उनके जीवन का महा झटका था। इस झटके से मन में निराशा के बादल छा गए। लगा जैसे अब कोई भी बोझा उठाया न जाएगा। विफलता से उपजी निराशा कितनी गहरी थी इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि मीराबाई चानू को फिर से सकारात्मक होने के लिए मनोचिकित्सकों की मदद लेनी पड़ी। गुरुजनों ने भी मीराबाई चानू को समझाया। हिम्मत हारने से कुछ नहीं होता। सफलता हासिल करने के लिए गिर-गिर कर उठना होता है। निराशा के दलदल में फंस गया मनुष्य यदि प्रयास न करे तो फिर उसी दलदल में सदा के लिए दफन हो जाता है। दफन होना मीराबाई चानू को मंजूर नहीं था।
परिवार वालों, मित्रों और प्रशिक्षकों की मदद से वह निराशा के दलदल से बाहर आई। अपनी तकनीक में सुधार किया। जहां कहीं से भी सुधार के लिए जरूरी प्रशिक्षण मिलने की गुंजाइश होती, वहां गई। सीखा- कुछ और सीखा। फैसला किया कि हार के सबक याद रखने हैं, हार को याद नहीं रखना है। कुछ करके दिखाना है। इसके लिए जितना भी त्याग करना पड़े, वह करेगी। वह अपने फैसले पर कायम रही। रियो ओलंपिक के बाद के पाँच सालों में पाँच दिन भी अपने घर पर नहीं रही। दिन-रात ओलंपिक पदक के सपने को जीती हुई उसने अपना सब कुछ छोड़ दिया। मां के हाथों का खाना उसे सबसे ज्यादा प्रिय रहा। मगर वह भी छूट गया। अब जबकि ओलंपिक पदक का सपना पूरा हुआ है, तो फिर से मन में मां के हाथ का खाना खाने की इच्छा जागी है।
जीत का जुनून ऐसा ही होता है। इस जुनून में आदमी अपनी भूख भूल जाता है। इस जुनून में आदमी बड़ी से बड़ी कुर्बानी देता है और फिर अपने सपने को जिंदा रखता है। पूरी शिद्दत के साथ प्रयास करने पर जब वह सपना सच होता है तो फिर अपनी कुर्बानियों का हिसाब लेने की फुरसत मिलती है।
रियो ओलंपिक की विफलता से टोक्यो ओलंपिक की सफलता के बीच मीराबाई चानू ने कई दूसरी मंजिलों को भी हासिल किया। उन्होंने 2017 में अमेरिका में आयोजित विश्व भारोत्तोलन चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीता और फिर 2018 में गोल्ड कोस्ट में आयोजित कॉमनवेल्थ खेलों में  भी सबसे ज्यादा वजन उठाकर सोने का तमगा हासिल किया। 2021 में ताशकंद में आयोजित एशियाई भारोत्तोलन चैंपियनशिप में मीराबाई चानू को कांस्य पदक प्राप्त हुआ। देश की ओर से उन्हें अर्जुन पुरस्कार, पद्मश्री, राजीव गांधी खेल रत्न पुरस्कार सहित अनेक सम्मान प्राप्त हो चुके हैं। टोक्यो ओलंपिक में रजत पदक जीतने के साथ ही वह ओलंपिक खेलों में रजत पदक जीतने वाली दूसरी भारतीय महिला बन गई हैं। रजत पदक जीतने वाली पहली महिला बैडमिंटन खिलाड़ी पीवी सिंधु हैं। इसी तरह भारोत्तोलन स्पर्धा में पदक जीतने वाली वह दूसरी महिला भारोत्तोलक हैं। उनसे पहले 2000 के सिडनी ओलंपिक में कर्णम मल्लेश्वरी ने कांस्य पदक जीता था।
मीराबाई चानू का पदक जीतना भारत का सबसे बड़ा नियोक्ता और देश की जीवन रेखा भारतीय रेल के लिए भी विशेष उपलब्धि का पल रहा। उनकी उपलब्धियों के आधार पर उनकी नियुक्ति पहले टिकट निरीक्षक के पद पर पूर्वोत्तर रेलवे में हुई, जहां अभी वह प्रधान मुख्य कार्मिक अधिकारी के कार्यालय में विशेष कार्य अधिकारी के पद पर कार्यरत हैं।
मीराबाई चानू की सफलता ने भारत के खेल इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ा है। देश की लड़कियों को इस पदक से नई ताकत मिली है। मीराबाई चानू पदक जीतकर अपने देश का नाम रोशन करना चाहती रही थीं, ऐसा हुआ। साथ ही उनके पदक जीतने से देश में एक नई रोशनी फैली जिससे एक पूरी पीढ़ी को प्रकाश मिलता रहेगा।
लेखक, कवि, मोटिवेशनल गुरु और भारतीय रेल यातायात सेवा के वरिष्ठ अधिकारी हैं।
दिलीप कुमार

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